And sometimes I do not wish to be a mirror..... I want to be cardboard, paper, anything that does not reflect. Does not reflect outwards.~ Ritu Mehra
कई बार जब आप किसी ख़ाली मकान का दरवाज़ा खटखटा रहे होते हैं तो पास से गुज़रने वाला कोई राहगीर आपको बता ही देता है, 'यहाँ कोई नहीं रहता'। कुछ समय पश्चात निर्जन मकान खंडहर होकर अपने निर्जन होने का स्वतः प्रमाण बन जाते हैं। पर मनुष्य की देह के साथ ऐसा नहीं होता।
आप किसी ख़ाली शरीर के सामने खड़े होकर चिल्ला रहे हों तो भी कोई राहगीर आपको 'यहाँ कोई नहीं रहता' कहकर नहीं चेताएगा और न ही वह ख़ाली देह खंडहर ही होगी।
ख़ाली देह बाहर से नहीं उजड़ती। भीतर से सड़ती है। धीरे-धीरे। जब भीतर सब कुछ सड़ जाता है तब जाकर कहीं सड़न बाहर आ पाती है। तब आप बस देखकर कह सकते हैं 'यहाँ कोई नहीं रहता, इस शरीर में जो रहता था उसे यहाँ रहने की अनुमति नहीं मिली'। निर्जन मकान ढह जाते हैं लेकिन निरात्मा शरीर! उन्हें मृत्यु तक ख़ुद को घसीटते रहने का शाप है। इसपर भी उनकी चेतना नहीं मरती, वह बस सड़ जाती है। उसे किसी का भी शरीर के भीतर रहना नहीं सुहाता। हमारे समाज में ऐसे कई वर्ग और संस्कृतियाँ हैं जहाँ लोगों को अपने ही शरीर में रहने की अनुमति नहीं है। जिस समाज में ऐसे लोगों की जनसंख्या अधिक हो वहाँ उन्हें परस्पर मैत्री और प्रेम सम्बन्ध बनाने में कोई परेशानी क्यों होगी? परेशानी तो उनके लिए है जो पूर्ण अधिकार सहित अपनी देह में रहते हैं। जो मानव शरीर की हर एक सुंदर कोशिका को सहेजते हुए उसमें सम्पूर्णता से रमते हैं। जिन्हें मनुष्य देह के सीमाहीन अनुभवों की लालसा है। देह छोड़कर भाग जाना बड़ी कायरता की बात है। मानव प्रकृति है, लेकिन मकान प्रकृति नहीं हुआ करते। यह ज़ाम्बि एपॉक्लिप्स कब शुरू हुई होगी इसका इतिहास में कोई ब्यौरा नहीं। यह एक इंफ़ेक्शन है जो धीरे-धीरे संस्कृति बन गया है।
मुझे लगता है कि यह इंफ़ेक्शन तब शुरू हुआ होगा जब मनुष्य ने प्रकृति को दरकिनार कर किसी मानव को श्रेष्ठ मान ईश्वर का दर्जा दे दिया होगा,या फिर किसी मानव से उसके मानव होने का अधिकार छीन लिया होगा.....
लेकिन अपनी देह छोड़कर भाग जाना, अपने शरीर में अधिकार सहित न रहना.....जो बचे-कुचे लोग अपनी देह में रहने का सामर्थ्य रखते हैं वे चेत जाएँ, यह इंफ़ेक्शन तेज़ी से फैल रहा है।
'नॉक-नॉक
यहाँ कोई नहीं रहता'।
Ritu Mehra
प्रेम के सन्दर्भ में-
आप एक बद से बदतर जीवन जीने वाले व्यक्ति को प्रेम और बेहतर ज़िन्दगी का झाँसा देकर क़ैद कर सकते हैं, उसे अपना बौली (बंधुआ मज़दूर) बना सकते हैं। पर अपनेआप में, केवल अपनी प्रकृति के हिसाब से एक शानदार जीवन जीने वाले किसी भी प्राणी को आप किस वस्तु का लालच देंगे? वह आपसे अनुभूतियाओं की बात करेगा और आप उसके सामने सोने का प्याला रखेंगे, वह आप पर हँसेगा।
ये चमकली चीज़ें, ये व्यक्तित्वविहीन प्रलोभन केवल सामाजिक और मानसिक गैरबराबरी की वजह से कारगर साबित हुआ करते हैं। हमारी संस्कृतियों ने कुछ लोगों को अप्राकृतिक रूप से दबाया है, उनके भीतर आत्म संदेह के बीज बोए हैं ताकि वे लोग जो वस्तुओं के आलावा और कुछ भी अर्जित नहीं कर सकते केवल भौतिकता के बल पर किसी को बंदी बना सकें।
परन्तु यह पद्धतियाँ तब ढेर हो जाती हैं जब निम्न माने जाने वाले इन्हीं समूहों से उठकर कोई इंसान वस्तुओं से भी विशाल हो जाता है।
जब वह नदी, जंगल, झरना, चट्टान होता है, या फिर होता है हिमालयन रोज़ फ़िंच....
ऋतु
मैं गुमनाम चिट्ठियाँ लिखकर हवाओं में उड़ाना चाहती हूँ, उनकी कश्तियाँ बनाकर उन्हें पानी में बहा देना चाहती हूँ। मुझे नहीं मालूम कि ऐसी चिट्ठियाँ पढ़ी जाएंगी भी कि नहीं। अभी कौनसा किसी की नज़र कर की गई मेरी बात सुनी जाती है? अभी भी तो हवाओं से ही बातें कर रही हूँ। क्या बिना नाम और पते की चिट्ठियाँ लुटाना इस दयनीय और तिरस्कार भरी मनः स्थिति से बेहतर नहीं होगा? बस अब सारी गांठें खोल कुछ कर देना चाहती हूँ। अपनी कोई इडियोसिन्क्रेसी ढूंढना। कुछ ऐसा जो पागलपन कहलाए, निरा बेतुकापन।
कुछ ऐसा जो सयाने लोगों को नापसन्द हो। सिली, क्रेज़ी, रिडिक्यूल्स, गूफ़ी इत्यादि। ताकि रंग बचे रहें, सपने बरक़रार रहें और मैं सांस लेती रहूँ, दिल हल्का रहे, अनायास ही मन में कोई साज़ बजे और मैं नाचने लगूँ। बस यूँ ही।
You are a woman not a pan. That face of yours can say so many things, twist it, turn it, express yourself. It's a very powerful cult, artists have carved it on idols and icons, religions have tried to snatch it from a woman. Express, funny face, express' {Raynard 2003}
I took him a bit too seriously.
In loving memory of one of my 'old men' crushes- Brook Raynard. R
मैं पहाड़ छोड़कर कभी नहीं जाना चाहती थी', माँ ने कहा 'पर जिस दिन छोड़ा उस दिन पहाड़ अपने साथ लेकर गई, गाड़, गधेरे, झरने, कर्मठता, यौवन, रंग, और हिमालय, सब कुछ। मेरे पास तुम्हें विरासत में देने को ये हिमालय है जो मैंने शीश पर ताज की तरह सदा पहने रखा है, संभाल सको तो अपने सर ले लेना, वरना इसकी भी ज़रूरत नहीं, विरासत ख़ैरात में नहीं दी जाती, खुद को इसके लायक साबित करना होता है।'
हम अलसाए, दिन ने आख़िरकार कुछ पल के लिए रंग बदलना छोड़ ठहरना चुना। केवल दोपहर के लिए, दिन भी स्थिर खड़ा रहा। कुछ ने पैर पसारे, कुछ ने राह चलते आँखें बंद कीं और एक सुरक्षित दूरी तक आँख मूंदे चलते रहे।
आँखों में सूरज की लालिमा पसरी, रोम छिद्र खुले....... तभी किसी ने एक गुमनाम गली में आईने के सामने अपनी तस्वीर खींची। एक दोपहर का वृत्त पूरा किया। इससे पहले कि दिन फिर से गतिमान होता, किसी ने अपने अस्तित्व और शरीर के बीच बंधे सेतु के बीचोंबीच एक रेखा खींची और उसे नाम दिया 'दोपहर'।
अब हर दोपहर उस लकीर पर खड़े होकर कोई चित्र सहेजता है। धुंधली और क्लान्त आँखों से उस पार देखता हुआ (पार्श्व में दोपहर की आवाज़ें तेज़ होती हैं, ये वो आवाज़ें हैं जो आपकी दोपहर की स्मृतियों में क़ैद हैं)।


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