And sometimes I do not wish to be a mirror..... I want to be cardboard, paper, anything that does not reflect. Does not reflect outwards.~ Ritu Mehra कई बार जब आप किसी ख़ाली मकान का दरवाज़ा खटखटा रहे होते हैं तो पास से गुज़रने वाला कोई राहगीर आपको बता ही देता है, 'यहाँ कोई नहीं रहता'। कुछ समय पश्चात निर्जन मकान खंडहर होकर अपने निर्जन होने का स्वतः प्रमाण बन जाते हैं। पर मनुष्य की देह के साथ ऐसा नहीं होता। आप किसी ख़ाली शरीर के सामने खड़े होकर चिल्ला रहे हों तो भी कोई राहगीर आपको 'यहाँ कोई नहीं रहता' कहकर नहीं चेताएगा और न ही वह ख़ाली देह खंडहर ही होगी। ख़ाली देह बाहर से नहीं उजड़ती। भीतर से सड़ती है। धीरे-धीरे। जब भीतर सब कुछ सड़ जाता है तब जाकर कहीं सड़न बाहर आ पाती है। तब आप बस देखकर कह सकते हैं 'यहाँ कोई नहीं रहता, इस शरीर में जो रहता था उसे यहाँ रहने की अनुमति नहीं मिली'। निर्जन मकान ढह जाते हैं लेकिन निरात्मा शरीर! उन्हें मृत्यु तक ख़ुद को घसीटते रहने का शाप है। इसपर भी उनकी चेतना नहीं मरती, वह बस सड़ जाती है। उसे किसी का भी शरीर के भीतर रहना नहीं सुहाता। हमारे समाज म...
Where wars are Satyagrahs and love has kohl eye (is not blind).